नेगी दा ग्रेट

नेगी दा ग्रेट: एक महीन रेखा जो अब और धुंधला गई

यूं तो गढरत्न नरेंद्र सिंह नेगी ने लोकप्रियता की बुलंदियों के जिस आसमान को छुआ है, वह जन सामान्य की कल्पनाओं के दायरे तक से कई बाहर है। लेकिन आज हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय गढ़वाल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में जो हुआ उसने वहां मौजूद बुद्धिजीवी समाज को भी गदगद कर दिया। यहां लोकप्रियता के चरम और महानता के बीच की महीन रेखा भी वजूद खो बैठी।

कार्यक्रम में नेगी दा को विश्वविद्यालय की ओर से डॉक्टर ऑफ लेटर्स उपाधि से सम्मानित किया गया। इस सम्मान के लिए विश्वविद्यालय का नेगी दा के सभी चाहने वालों की ओर से साधुवाद। यहां मानद उपाधि लेने के बाद नेगीदा ने अपने संबोधन जो कहा, उससे विवि का वह सभागार यकायक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा जहां देशभर के बुद्धिजीवियों का जमावड़ा लगा था। यह बात भी सोलह आने सच है कि बुद्धिजीवी समाज के हाथ खास तौर पर तालियों के लिए तो यूं ही नहीं उठते। यानी “क्वी ता बात होली”

यहां नेगी दा ने अपने सम्मान पर कहा कि गढ़वाल विश्वविद्यालय की ओर से यह मेरे माध्यम से पहाड़ में रहने वालों के साथ ही गढ़वाली भाषा, संस्कृति कर्मियों, कलाकारों और साहित्यकारों का सम्मान है। जिसने भी सुना वह है सहज ही बोल उठा कि यह नेगी दा की महानता है।

नेगीदा की जगह कोई और होता तो शायद सम्मान पर पहले खुद मन ही मन बल्लियां उछलता और बहुत हुआ तो उसके बाद उसीको समर्पित करने की बात कह कर भी खुद को और बड़ा जताने की कोशिश करता। लेकिन नेगी दा तो नेगी दा हैं। जिनका कोई सानी नहीं।

सच में अपने को लोक भाषा, संस्कृति साधकों के सम्मान का सिर्फ माध्यम बता कर नेगी दा ने लोकप्रियता के चरम और महानता के बीच की महीन रेखा को और धुंधला कर दिया है।

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