शिक्षक संघर्षः ज्ञान के पथ पर यह विवेकहीनता का अंधेरा

 

पदोन्नति के लिए शिक्षकों ने अविवेक पूर्ण रस्साकस्सी, खुद टीचरों ने ही बांधे हैं सरकार के हाथ

उत्तराखंड में कुछ सरकारी शिक्षक चॉकडाउन किए हैं और कुछ उसी मांग के विरोध में कोर्ट में अर्जी लगाए हैं। प्रदेश सरकार की ओर से यह प्रयास किए जा रहे हैं कि पात्र अध्यापकों परमोशन दिया जा सके। स्वयं शिक्षा मंत्री महोदय शिक्षक संघ की बेठकों व मीडिया के सवालों पर यह कई बार दोहरा चुके हैं कि शिक्षक संगठन अदालत से अपने मामले वापस ले लेते हैं, तो बगैर देर किए परमोशन की प्रक्रिया शुरू कर देंगे।
हमारे मार्गदर्शक चिंतकों ने साफ कहा कि शिक्षक के उपर भावी पीढ़िंयों को विवेक प्रदान करने की बहुत ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। राष्ट्र व समाज निर्माण की असली धुरी शिक्षक ही हैं। एक शिक्षक के आचरण को प्रेरक और अनुकरणीय होना जरूरी माना जाता है। उसके भीतर ज्ञान, विवेक, प्रेरणा और समर्पण जैसे गुण जरूरी हों जिन्हें वह अपने शिष्यों में प्रस्फुटित करना चाहता हो।

लेकिन यहां देखिए! ज्ञान की रोशनी फैलाने का जिम्मा संभालने वाले समाज निर्माण के इस बेहद अहम वर्ग के पाले में यहां एक अजब सा अंधेरा दिख रहा है। अपने आपस में ही एक दूसरे की टांग खींचने व एक दूसरे के परमोशन का खेल खराब करने का खेल किसी से छुपकर नहीं बल्कि खुलेआम खेला जा रहा है।
जिस मांग को लेकर शिक्षक चॉकडाउन कर आंदोलन पर अड़े हैं ठीक उसी तरह की पदोन्नति की मुखालफत और सीधी भर्ती कराने के लिए कई शिक्षकों ने अदालत में वाद दायर किए हैं। दुर्योग देखिएः इस रस्साकस्सी के दोनों ओर शिक्षक ही हैं। शिक्षकों की यह लड़ाई ठीक वैसी ही है जैसे एक हाथ से दूसरे हाथ पर चोट की जा रही हो। खुद पर चोट करता यह अप्रत्यक्ष संघर्ष वही शिक्षक कर रहे हैं जिन्हें यहां की सरकारी शिक्षा स्वयं का गौरव लौटाने की उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। जिनसे रोशनी की उम्मीद की जा रही है वही अंधेरे के पालक जैसे व्यवहार पर आमादा हैं।
यह पहली बार हो रहा है जब सरकार मांग मानने को तैयार बैठी है। लेकिन कार्मिकों के धड़े एक दूसरे की राहें अंधेरी करने को मानो संकल्पबद्ध हो रखे हैं। और सबसे बड़ी चिंता वाली बात यह है कि शिक्षकों के धड़े जिस रस्से का पाला अपनी अपनी ओर खींचने को दांत पीस रहे हैं उसकी धुरी पर रस्से लबेता खाए हम सबके नौनिहाल हैं। उनकी चिंता को प्राथमिकता में रखना जरूरी है। क्यों न अविवेकी आवरण को दर किनार कऱ स्वयं के आचरण को अनुकरणीय बनाकर शिक्षक बनने मानदंडों पर खरा उतरा जाए। यहां किसी की भावी पीढ़ी व भविष्य का सवाल जो है।

यहां मशहूर शायर बसीम बरेलवी की दो पंक्तियां याद आ रही हैं।

नई उम्रों की खुद मुख्तारियों को कौन समझाए
कहां से बच के चलना है कहां जाना जरूरी है।

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